न्याय की हुंकार से हिला प्रशासन: सुल्तानपुर में उमड़ा ‘न्याय का सैलाब’, 24 घंटे में कार्रवाई का अल्टीमेटम

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सुल्तानपुर। जनपद में जब न्याय की उम्मीदें धुंधली पड़ने लगीं, तो समाज की संगठित शक्ति ने शासन-प्रशासन के गलियारों में हलचल पैदा कर दी। सरदार सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष और हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता शनि पटेल के एक आह्वान पर प्रदेश भर से जुटे हजारों न्यायप्रिय लोगों ने सुल्तानपुर की धरती पर वह कर दिखाया, जो महीनों से लंबित था।

सत्ता और संगठन की एकजुटता: ‘कुर्मी का प्रयास, यूनिटी का प्रभाव’

​”कुर्मी का प्रयास, यूनिटी का प्रभाव” के नारे के साथ जुटे जनसैलाब ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब अन्याय को और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। ग्राम सरैया (कादीपुर) के पंकज वर्मा और ग्राम साटा (जयसिंहपुर) के मृतक हिंमाशू वर्मा के परिजनों की सिसकियाँ अब एक गूँज बन चुकी हैं। समाज के इस संगठित दबाव का ही परिणाम था कि जिले की कमान संभाल रहीं एसपी चारू निगम को स्वयं मोर्चा संभालना पड़ा।

संवेदनशीलता और सख्ती: एसपी ने खुद की पीड़ितों से बात

​प्रशासनिक संवेदनशीलता की मिसाल पेश करते हुए पुलिस अधीक्षक चारू निगम ने खुद पीड़ित परिवारों से फोन पर लंबी वार्ता की। उन्होंने न केवल उनकी पीड़ा सुनी, बल्कि यह भी महसूस किया कि न्याय में हो रही देरी जन-आक्रोश का मुख्य कारण है। एसपी ने तत्काल एएसपी अखंड प्रताप सिंह को कड़े लहजे में निर्देशित किया कि विधिक प्रक्रिया में रत्ती भर भी ढिलाई न बरती जाए।

प्रशासन का वादा: 24 घंटे में दिखेगा एक्शन

​हजारों की भीड़ और बढ़ते दबाव के बीच प्रशासन ने आधिकारिक आश्वासन दिया है कि 24 घंटे के भीतर ठोस विधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाएगी। एएसपी ने आनन-फानन में संबंधित अधिकारियों की बैठक बुलाकर फाइलों को गति देना शुरू कर दिया है। पीड़ित परिवारों को अब यह भरोसा होने लगा है कि उनकी आवाज़ लखनऊ से लेकर दिल्ली तक सुनी जा रही है।

निष्कर्ष: संघर्ष से ही संभव है न्याय

​सुल्तानपुर का यह घटनाक्रम प्रदेश के लिए एक नजीर बन गया है। यह साबित हो गया है कि जब समाज अपने मतभेदों को भुलाकर एकजुट होता है, तो सिस्टम को जवाबदेह बनना ही पड़ता है। हालांकि, संघर्ष की यह मशाल तब तक जलती रहेगी, जब तक दोषियों को उनके अंजाम तक नहीं पहुँचा दिया जाता।

विशेष कवरेज:

आर टी वर्मा

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